भाषा कट्टरवाद छोड़िए ( जगदीश बाली)


कसर हिन्दीवादी देशप्रेमी राष्ट्र भाषा के नाम पर अंग्रेज़ी के विरुद्ध बहुत बड़ा बवाल खड़ा कर देते हैं ! इस तरह की अंग्रेज़ी विरोधी विचारधारा पर मुझे सख्त एतराज़ है जिस में हिन्दी के लिए अंग्रेज़ी को कोसा जाए ! यह कह कर मेरा मकसद कोई विवाद खड़ा करना नहीं क्योंकि मुझे तो इस बात पर भी ऎतराज़ है कि अंग्रेज़ी को हिन्दी की बली चढ़ा कर तरजीह दी जाए ! यह भी कतई न माना जाए कि मैं देशद्रोही हूं और न ही मैं यह मानने को तैयार हूं हिन्दीवाले मुझ से ज़्यादा देशभक्त हैं ! अंग्रेज़ी का प्रयोग कर भी मैं उतना ही हिन्दुस्तानी हूं जितना हिन्दी का प्रयोग कर ! वास्तव में दोनों ही भाषाएं मुझे अज़ीज़ है ! ये दो ही क्यों ? मैं इस बात में खुशी मह्सूस करूंगा कि मुझे अधिक से अधिक भषाओं का बोध हो और मैं इन भषाओं को बोल और लिख सकूं ! सभी भषाओं को समान दॄष्टि व सम्मान से देखना एक दिलेर संस्कृति की द्योतक है ! ये कहने की आवश्यकता नहीं है कि अगर हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है तो अन्ग्रेज़ी एक वैश्विक भाषा !

जहां तक भाषा के पढ़ने-पढ़ाने की बात है् तो निःसंदेह हिन्दी का दर्ज़ा अंग्रेज़ी से पहले आना ही चाहिए क्योंकि हिन्दी भाषा किसी अन्य भाषा के मुकाबले हमरी संस्कृति को बेहतर ढंग से व्यक्त करती है ! इस दृष्टि से यह हमें जोड़े रखने में अहम भूमिका अदा करती है ! पर इस के मायने ये नहीं कि किसी हिन्दी भाषा की ठेकेदारी ले कर हम दूसरी भाषा को गाली दें ! वास्तव में अगर हिन्दी को विश्व स्तर पर अपना डंका बजाना है तो अंग्रेज़ी इस में अहम भूमिका निभा सकती है ! अतः अंग्रेज़ी को तिरस्कृत नहीं बल्कि परिष्कृत करना चाहिए !

किसी विशेष भाषा को तरजीह देकर, किसी दूसरी को तिरस्कृत करने का विचार एक कुन्द सोच रखने वाला भाषाई कट्टरवादी ही रख सकता है ! हिन्दी को महत्व दिया जाय, मुझे कोई शिकायत नहीं, मगर ये मुझे गंवारा नहीं कि अंग्रेज़ी को तिरस्कृत किया जाय ! हम बेहतर हिन्दी बोलें व लिखें पर इस सब के बाद इस लोकतन्त्र में हर एक व्यक्ति किसी भी भाषा क प्रयोग करने के लिए स्व्तन्त्र है !

भूलना नहीं चाहिए कि अंग्रेज़ी सहित्य ने भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया है ! अनीता देसाई, आर के नारायनन, खुशवन्त सिंह, राजा राव अंग्रेज़ी साहित्य में छोटे नाम नहीं हैं ! किरन देसाई की ‘Inheritance of Loss' अर्विंद अडिगा की ‘The White Tiger', आरुन्धती की 'God of Small things'  ऐसी कृतियां है जिनके कारण साहित्य के क्षेत्र में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना झंडा गाड़ा है ! अगर टैगोर की ’गीतांजली’ अंग्रेज़ी में अनुवादित न हुई होती तो नोबेल उन्हें न मिलता !
सृजनात्मक सहित्य से हट कर भी भारतीय लेखकॊं ने अन्य विषय में अंग्रेज़ी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना कर देश का नाम रोशन किया है ! अर्बिंन्दो घोष, नेहरू, गांधी, अमार्तय सेन और अबुल कलाम की पुस्तकें इस बात कि द्योतक हैं कि अंग्रेज़ी को माध्यम बना कर भी ये व्यक्ति इस देश के आदर्श माने जाते हैं !
कोई भी भाषा अपने साथ सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्य लिये होती है ! विभिन्न भाषाओं की जानकारी रखना, उन्हें स्वीकार कर लेना, उन्हें सम्मिलित कर लेना एक दिलेर व अमीर संस्कृति के गुण हैं ! शायद अंग्रेज़ी की यही फ़ितरत है कि यह आज वैश्विक भाषा है !
निज भाषा को उन्नति है सब उन्नति को मूल - भारतेन्दु जी के इन शब्दों पर मुझे जरा भी संदेह नहीं, पर उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं कहा और न ही उनका कभी यह आशय रहा कि - पर भाषा को निन्दा है सब उन्नति को मूल !       

'मन्दिर-मस्जिद ( जगदीश बाली)

न्सान जब पैदा होता है, वह न हिन्दु होता है, न मुस्लमान, न सिख, न इसाई, न कुछ और ! वह एक इन्सान के रूप मैं पैदा होता है ! वह न ’अल्ला हू अकबर, कह्ता है, न ’हर हर महादेव’ ! वह तो बस खुदा के घर से आया पाक दामन प्राणी होता है ! ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता है, उसे यह सिखा दिया जाता है कि वह या तो हिन्दु है या फ़िर मुस्लमान या कोई और ! मज़हब उस्की पह्चान बन जाता है ! इस मज़हबी कश्मकश मैं वह आदमियत खो देता है ! किसी एक मज़हब का हो कर खुदा, भगवान या जिजस की पैरवी करते करते वह अल्ला से दूर हो जाता है !
कोई कहता है मन्दिर मैं मिलेगा, कोई कहता है मस्जिद में मिलेगा, किसी को गिरिजाघरों में दिखाई देता है तो किसी को दीदार होते हैं मठ बिहारों में ! मगर खुदा अगर है तो वह निवास करता है इन्सान के दिल में, उस के अच्छे कर्मों में, उस की नेक नियत में ! सन्त कबीर ने क्या खूब फ़रमाया है :

मोको कहां ढूंडे  रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में, 
न मन्दिर में न मस्जिद में न काबे कैलास में ! 

मगर इस बात को दरकिनार कर आदमी उलझा है मन्दिर और मस्जिद के विवाद में ! यों ही अगर मनिदर और मस्ज़िदें टूटती  रहीं तो बंट जाएगा ये भारत कई भागों में और इस हिन्दोस्तां के अस्तितव पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लग जायेगा ! बन जाएगा एक और पकिस्तान, एक और बंगलादेश और मालूम नहीं कितने स्तान ! इस से अच्छा तो ये है कि न मन्दिर रहे न मस्जिद रहे एक मयखाना खॊल दिया जाय क्यॊंकि-
 ’मन्दिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला’! और मयखाने से निकल कर कम से कम आदमी इन्सानियत के बोल तो बोलता है:

मन्दिर वालो मुझे मन्दिर मे पीने दो,
मस्जिद वालो मुझे मस्जिद मे पीने दो,
नहीं तो ऐसी जगह बताओ जहां खुदा नहीं !

कितनी विडम्बना की बात है कि खून के लिए तड़्पते रोगी को चन्द कतरे खून के नसीब नहीं होते और वही लहू सड़्कों पर बह रहा होता है ! उस पर प्रकाष्ठा ये कि यह लहू खुदा के नाम पर बह रहा होता है !
क्या ही अच्छा हो अगर हम सब धर्मों को अपना मानें और खुद को सब धर्मों का मानें ! क्योंकि किसी शायर ने बहुत खूब कहा है -

न हिन्दु बनेगा, न मुस्लमान बनेगा,
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा !

WELL WISHERS